दुल्हन की तरह सजी जनकपुरी, हो रहा है सीता-राम विवाह
"Jai shree Ram"
राम आ रहे हैं...जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो रहे हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस). इस श्रृंखला 'रामचरित मानस' में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका पांचवां खंड.
जनकपुरी में सीताजी और रामजी के विवाह की तैयारियां चल रहीं हैं. अयोध्या में भी कम उत्साह नहीं है. फिर भिक्षुकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार की निछावरें उनको दीं. 'चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों. यों कहते हुए वे अनेक प्रकार के सुंदर वस्त्र पहन पहनकर चले. आनंदित होकर नगाड़े वालों ने बड़े जोर से नगाड़ों पर चोट लगाई. सब लोगों ने जब यह समाचार पाया, तब घर-घर बधावे होने लगे. चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकी जी और श्रीरघुनाथजी का विवाह होगा. यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेम-मग्न हो गए और रास्ते, घर तथा गलियां सजाने लगे. यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजी की मंगलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होने से वह सुंदर मंगलरचना से सजाई गई. ध्वजा, पताका, परदे और सुंदर चंवरों से सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है. सोने के कलश, तोरण, मणियों की झालरें, हल्दी, दूब, दही, अक्षत और मालाओं से-लोगों ने अपने-अपने घरों को सजाकर मंगलमय बना लिया. गलियों को चतुरसम से सींचा और द्वारों पर सुंदर चौक पुराये. [चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूर से बने हुए एक सुगन्धित द्रव को चतुरसम कहते हैं]. बिजली की-सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिन के बच्चे के-से नेत्रवाली और अपने सुंदर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुड़ाने वाली सुहागिनी स्त्रियां सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहां-तहां झुंड-की-झुंड मिलकर मनोहर वाणी से मंगलगीत गा रही हैं, जिनके सुंदर स्वर को सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं. राजमहल का वर्णन कैसे किया जाय, जहां विश्व को विमोहित करने वाला मंडप बनाया गया है.
अनेकों प्रकार के मनोहर मांगलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत से नगाड़े बज रहे हैं. कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं. सुंदरी स्त्रियां श्रीरामजी और श्रीसीताजी का नाम ले-लेकर मंगलगीत गा रही हैं. उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है. इससे उसमें न समाकर मानो वह उत्साह चारों ओर उमड़ चला है. दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहां समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है. फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो. यह सुनते ही दोनों भाई (भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनंदवश पुलक से भर गए. भरतजी ने सब साहनी (घुड़साल के अध्यक्ष) बुलाए और उन्हें घोड़ों को सजाने की आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े. उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाए. रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गए. सब घोड़े बड़े ही सुंदर और चंचल चाल के हैं. वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों. अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता. ऐसी तेज चाल के हैं मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हैं.
उन सब घोड़ों पर भरतजी के समान अवस्था वाले सब छैल छबीले राजकुमार सवार हुए. वे सभी सुंदर हैं और सब आभूषण धारण किए हुए हैं. उनके हाथों में बाण और धनुष हैं तथा कमर में भारी तरकस बंधे हैं. सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं. प्रत्येक सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलाने की कला में बड़े निपुण हैं. शूरता का बाना धारण किए हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए. वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं. सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत विलक्षण बना दिया है. उनमें सुंदर चंवर लगे हैं और घंटियां सुंदर शब्द कर रही हैं. वे रथ इतने सुंदर हैं मानो सूर्य के रथ की शोभा को छीने लेते हैं.
अगणित श्यामकर्ण घोडे थे. उनको सारथियों ने उन रथों में जोत दिया है, जो सभी देखने में सुंदर और गहनों से सजाए हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं. जो जलपर भी जमीन की तरह ही चलते हैं. वेग की अधिकता से उनकी टाप पानी में नहीं डूबती. अस्त्र-श








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